Buddhist Heritage: दरौली में 2200 वर्ष पुरानी बौद्ध विरासत उपेक्षित: विदेशी शोधार्थियों ने किया घंटों साधना, संरक्षण की उठी मांग

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दरौली के अमरपुर केवटलिया गांव में सरयू नदी के दक्षिणी तट पर स्थित प्राचीन खंडहर एक बार फिर चर्चा में

डिजिटल न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l पटना

संवाददाता। सिवान

दरौली (सिवान)। प्रखंड मुख्यालय से दो किलोमीटर पश्चिम अमरपुर केवटलिया गांव में सरयू नदी के दक्षिणी तट पर स्थित प्राचीन खंडहर एक बार फिर चर्चा में है। करीब 2200 वर्ष पुरानी मानी जा रही यह इमारत मौर्य, कुषाण और गुप्तकालीन ईंटों से निर्मित बताई जा रही है। स्थानीय ग्रामीणों और शोधार्थियों का दावा है कि यह स्थल प्राचीन बौद्ध विहार के रूप में स्थापित रहा होगा। बावजूद इसके, यह धरोहर आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में उपेक्षित पड़ी है।

मंगलवार की सुबह वियतनाम सहित विभिन्न देशों से आए बौद्ध शोधार्थियों एवं भिक्षुओं ने स्थल का भ्रमण किया और घंटों साधना की। वियतनाम की भिक्षुणी बोधिचित्ता माता ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार को जिले के पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण के लिए ठोस पहल करनी चाहिए। वहीं धम्म चिता ने कहा कि सिवान की धरती पर भगवान बुद्ध के उपदेशों की गूंज रही है, इसे सहेजना आवश्यक है।

शोधार्थी भंते डॉ. अशोक शाक्य ने बताया कि ईंटों की बनावट और अंदर बनी कमल, चक्र तथा देवी-देवताओं की कलाकृतियां इसकी प्राचीनता का प्रमाण देती हैं। विशाल भंते ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि यह पूरा क्षेत्र प्राचीन काल में मल्ल गणराज्य के अधीन था और मल्ल राजा भगवान बुद्ध के परम शिष्य थे। संभव है कि उसी काल में यह बौद्ध विहार निर्मित हुआ हो।

शोधार्थी डॉ. कृष्ण कुमार सिंह ने बताया कि दोन में मिली गढ़ देवी की प्रतिमा बौद्ध धर्म की तारा से मिलती-जुलती है। साथ ही गढ़वाल राजा गोविंदचंद्र देव का ताम्रपत्र और पालकालीन मूर्तियों की प्राप्ति इस क्षेत्र के बौद्ध संबंधों को मजबूत करती है। उन्होंने चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा-वृतांत का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने भी ‘बड़’ ग्राम का उल्लेख किया है।

ग्रामीणों के अनुसार, करीब 80-90 वर्ष पहले तक यहां बौद्ध भिक्षुओं का आना-जाना लगा रहता था। वर्ष 2015, 2018 और हाल के वर्षों में भी वियतनाम, थाईलैंड, म्यांमार और श्रीलंका से भिक्षु यहां पूजा-अर्चना कर चुके हैं।

इतिहास और आस्था से जुड़ा यह स्थल संरक्षण की बाट जोह रहा है। स्थानीय लोगों ने पुरातत्व विभाग से सर्वे कराकर इसे संरक्षित स्मारक घोषित करने की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत को पहचान सकें।

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