Big Breaking: सिवान नगर परिषद में संवेदकों का भी अता-पता नहीं, नियमों के बावजूद रिकॉर्ड गायब

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डिपार्टमेंटल कार्यादेश के स्पष्ट प्रावधान, इकरारनामा और जीएसटी दस्तावेज अनिवार्य;

फिर भी 50 से अधिक संवेदकों की सूची से अनजान है विभाग


डिजिटल न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l पटना

कृष्ण मुरारी पांडेय। सिवान।
नगर परिषद सिवान में विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सामने आई अव्यवस्था अब नियमों और प्रावधानों के उल्लंघन की ओर इशारा कर रही है। हैरानी की बात यह है कि जिन संवेदकों के माध्यम से करोड़ों रुपये की विकास योजनाएं पूरी की गईं, उनके नाम, पते और मोबाइल नंबर तक का रिकॉर्ड नगर परिषद के पास उपलब्ध नहीं है। जबकि डिपार्टमेंटल कार्यादेश जारी करने और कार्य संपन्न कराने को लेकर स्पष्ट नियम पहले से ही निर्धारित हैं।

किसी निजी व्यक्ति या ठेकेदार के नाम पर सीधे जारी नहीं होता डिपार्टमेंटल कार्यादेश

प्रावधान के अनुसार, नगर परिषद में डिपार्टमेंटल कार्यादेश कभी भी किसी निजी व्यक्ति या ठेकेदार के नाम पर सीधे जारी नहीं होता। यह कार्यादेश नगर परिषद या संबंधित विभाग के किसी परमानेंट कर्मचारी, प्रायः कनीय अभियंता (जेई), के नाम पर ही निर्गत किया जाता है। इसी कर्मचारी के माध्यम से योजना का क्रियान्वयन कराया जाता है।

जेई को नगर परिषद के ईओ के साथ इकरारनामा करना अनिवार्य

नियम यह भी बताते हैं कि किसी भी योजना का वर्क ऑर्डर जारी करने से पहले संबंधित जेई को नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी (ईओ) के साथ इकरारनामा करना अनिवार्य है। इस इकरारनामे में योजना की लागत, कार्य की प्रकृति, समय सीमा और जिम्मेदारी तय की जाती है। जब तक यह इकरारनामा विधिवत रूप से संपन्न नहीं होता, तब तक किसी भी हाल में वर्क ऑर्डर जारी नहीं किया जा सकता।

ठेकेदार का जीएसटी सर्टिफिकेट प्राप्त कर विभागीय रिकॉर्ड में सुरक्षित रखना अनिवार्य

इकरारनामा होने के बाद अगला महत्वपूर्ण प्रावधान ठेकेदार से संबंधित है। नियमों के अनुसार, जेई जिस ठेकेदार या संवेदक से कार्य कराते हैं, उसका जीएसटी सर्टिफिकेट प्राप्त कर उसे विभागीय रिकॉर्ड में सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है। इसका कारण स्पष्ट है—कार्य पूर्ण होने के बाद जब भुगतान की प्रक्रिया होती है, तो जीएसटी सर्टिफिकेट के बिना भुगतान संभव नहीं है।

प्रावधान के तहत प्रक्रिया यह होती है कि योजना का कार्य पूर्ण होने पर नगर परिषद जेई को भुगतान करती है और फिर जेई संबंधित ठेकेदार को भुगतान करता है। इस पूरी प्रक्रिया में ठेकेदार का जीएसटी पंजीकरण, बिल, मापी पुस्तिका और अन्य दस्तावेज अनिवार्य माने जाते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि विभाग के पास ठेकेदारों की सूची और उनके दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो भुगतान कैसे और किन आधारों पर किया गया।

चर्चाओं के अनुसार, नगर परिषद में करीब 50 से अधिक संवेदक विभिन्न योजनाओं का कार्य पूरा कर चुके हैं। लेकिन वे संवेदक कौन हैं, कहां के हैं और किस योजना में उन्होंने काम किया—इसकी स्पष्ट जानकारी किसी अधिकारी या शाखा के पास नहीं है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि संभावित अनियमितताओं की आशंका भी बढ़ा रही है।

क्या कहते हैं नगर परिषद के नगर प्रबंधक बालेश्वर राय

नगर परिषद के नगर प्रबंधक बालेश्वर राय ने इस पूरे मामले को गंभीर और आश्चर्यजनक बताया है। उन्होंने कहा कि संवेदकों का नाम और मोबाइल नंबर विभाग के पास नहीं होना चिंता का विषय है। कई बार संबंधित शाखा से सूची मांगी जा चुकी है, लेकिन अब तक उपलब्ध नहीं कराई गई है। उन्होंने कहा कि पूरे प्रकरण की जानकारी जुटाई जा रही है और रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं।

जानकारों का मानना है कि यदि नियमानुसार इकरारनामा और जीएसटी दस्तावेज मौजूद हैं, तो संवेदकों की पहचान सामने आनी ही चाहिए। ऐसे में रिकॉर्ड का अभाव या तो भारी लापरवाही का परिणाम है या फिर जानबूझकर जानकारी छिपाने की कोशिश। फिलहाल, जांच की बात कही जा रही है, लेकिन नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों के जवाब अब भी बाकी हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट ने मांगी तीनों इंजीनियरों के बैंक खातों से संबंधित जानकारी

आरटीआई एक्टिविस्ट, सिवान नगर परिषद के पूर्व वार्ड पार्षद और जन सुराज पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष इंतखाब अहमद ने नगर परिषद प्रशासन से तीनों इंजीनियरों के बैंक खातों से संबंधित जानकारी मांगी है।

इंतखाब अहमद ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन देकर मांग की है कि नगर परिषद में कार्यरत तीनों इंजीनियरों के खातों का स्टेटमेंट सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने विशेष रूप से 1 अप्रैल 2023 से अब तक इन इंजीनियरों के खातों में कितनी राशि का भुगतान हुआ है, इसकी पूरी जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने संबंधित इंजीनियरों का बैंक खाता नंबर और आईएफएससी कोड उपलब्ध कराए जाने को भी जरूरी बताया है।

इंतखाब अहमद का कहना है कि जब विभागीय कार्यादेश सीधे किसी ठेकेदार के नाम पर नहीं बल्कि जेई जैसे परमानेंट कर्मचारी के नाम पर जारी होते हैं, तब भुगतान की पूरी श्रृंखला इंजीनियरों के माध्यम से होती है। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि नगर परिषद से कितनी राशि इंजीनियरों के खातों में गई और उसका उपयोग किस तरह से किया गया। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता के लिए यह जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

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