छपरा में दर्शन का महाकुंभ, 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन का भव्य आगाज; देशभर के विद्वानों का जुटान
एजुकेशन न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l पटना
कृष्ण मुरारी पांडेय। पटना/छपरा। जय प्रकाश विश्वविद्यालय परिसर में अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 70वें राष्ट्रीय अधिवेशन का भव्य शुभारंभ हुआ। 23 से 25 मार्च तक चलने वाले इस तीन दिवसीय अधिवेशन का केंद्रीय विषय “चराचर संवेदी एकात्मता: भारतीय जीवन दर्शन” रखा गया है। उद्घाटन राज्यपाल सह कुलाधिपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सय्यद अता हसनैन ने दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम में देशभर के विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।

उद्घाटन सत्र गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अतिथियों का स्वागत किया गया। कुलपति प्रो. (डॉ.) परमेंद्र कुमार बाजपेई सहित विश्वविद्यालय परिवार ने सभी आगंतुकों का अभिनंदन किया। पूरे परिसर में बौद्धिक ऊर्जा और अकादमिक उत्साह का माहौल बना रहा।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि आज के दौर में राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि विचारों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन “चराचर संवेदी एकात्मता” के माध्यम से समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो प्रकृति, मानव और समाज के बीच संतुलन स्थापित करता है। उन्होंने आधुनिक विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए मानवीय मूल्यों को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस अवसर पर राज्यपाल ने विश्वविद्यालय परिसर में तीन नए भवनों और एक गैलरी का उद्घाटन भी किया।

कुलपति प्रो. (डॉ.) परमेंद्र कुमार बाजपेई ने अपने संबोधन में कहा कि यह अधिवेशन विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने अधोसंरचना विकास, परीक्षा प्रणाली में सुधार, ऑनलाइन प्रक्रियाओं को बढ़ावा और छात्र सहायता केंद्र की स्थापना जैसे प्रयासों की जानकारी दी। साथ ही पीएम उषा योजना और डीएसटी-फिस्ट कार्यक्रम के माध्यम से शैक्षणिक और शोध गतिविधियों को सुदृढ़ करने की दिशा में किए जा रहे कार्यों का उल्लेख किया।
अधिवेशन के अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा ने विषय प्रवेश कर “चराचर संवेदी एकात्मता” की दार्शनिक पृष्ठभूमि को विस्तार से समझाया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रसार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय दर्शन वैश्विक स्तर पर एक संतुलित जीवन दृष्टि प्रदान करता है।

इस अधिवेशन में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से कई प्रख्यात विद्वान शामिल हुए। इनमें अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा के दर्शनशास्त्र विभाग के डॉ. श्रीकांत मिश्र, तिलका मांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर के डॉ. मनीष कुमार प्रमुख रूप से शामिल रहे। इसके अलावा परिषद् के सभापति प्रो. अमरनाथ झा, सचिव प्रो. किस्मत कुमार सिंह, आयोजन सचिव प्रो. सुशील कुमार श्रीवास्तव सहित अनेक शिक्षाविद और शोधकर्ता मौजूद रहे।

आयोजन सचिव प्रो. सुशील कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि 25 मार्च तक चलने वाले इस अधिवेशन में विभिन्न अकादमिक सत्रों के माध्यम से विषय के अलग-अलग आयामों पर गहन चर्चा की जाएगी। समापन सत्र में तीन दिनों के विमर्श का सार प्रस्तुत किया जाएगा, जो शोधार्थियों और शिक्षकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. ऋचा मिश्रा ने किया।
अधिवेशन में विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र-शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। पूरे परिसर में ज्ञान-विमर्श और वैचारिक आदान-प्रदान का वातावरण बना हुआ है, जिससे यह आयोजन न केवल शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया है, बल्कि भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा को नई दिशा देने का कार्य भी कर रहा है।






