Consumer Court: डीटीओ के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में दायर वाद खारिज, सरकारी काम में देरी को ‘डिफिशिएंसी इन सर्विस’ नहीं माना

Share

छह साल से बाइक का नामांतरण नहीं होने पर आशीष विजयादित्य ने दायर किया था केस

आयोग ने कहा- डीटीओ वैधानिक कर्तव्य निभाता है, उपभोक्ता को व्यावसायिक सेवा नहीं देता

क्राइम न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l पटना

विधि संवाददाता l सिवान |

मोटरसाइकिल के नामांतरण में कथित देरी को लेकर जिला परिवहन पदाधिकारी (डीटीओ), सिवान के खिलाफ जिला उपभोक्ता आयोग में दायर वाद को आयोग ने उपभोक्ता विवाद के दायरे से बाहर माना है। आयोग के अध्यक्ष जयराम प्रसाद और सदस्य मनमोहन कुमार की पीठ ने मामले में प्रस्तुत परिवार पत्र, शपथ पत्र एवं अन्य दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद कहा कि डीटीओ द्वारा किए जाने वाले वैधानिक कार्यों को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत व्यावसायिक सेवा नहीं माना जा सकता।

मामला सिवान नगर निवासी आशीष विजयादित्य से जुड़ा है। वादी का आरोप था कि पिछले छह वर्षों से उनकी मोटरसाइकिल का नामांतरण उनके नाम से नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में उन्होंने विक्रय पत्र, अनापत्ति प्रमाण पत्र और डीटीओ कार्यालय में जमा की गई राशि से संबंधित दस्तावेज भी आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए थे।

- Sponsored -

दूसरे नोटिस पर डीटीओ हुए उपस्थित, जवाब नहीं किया दाखिल

मामले की सुनवाई के दौरान विपक्षी जिला परिवहन पदाधिकारी दूसरे नोटिस पर आयोग के समक्ष उपस्थित हुए, लेकिन उनकी ओर से जवाब दाखिल नहीं किया गया। इसके बाद आयोग ने उपलब्ध दस्तावेजों और मामले से जुड़े कानूनी प्रावधानों की समीक्षा की।

आयोग ने स्पष्ट किया कि ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना, वाहनों का रजिस्ट्रेशन करना और चालान काटना डीटीओ के वैधानिक दायित्वों में शामिल है। इन कार्यों के लिए नागरिकों से ली जाने वाली सरकारी फीस या कर को व्यावसायिक प्रतिफल यानी ‘कंसीडरेशन’ नहीं माना जा सकता।

डीटीओ और नागरिक के बीच उपभोक्ता-सेवा प्रदाता का संबंध नहीं

आयोग ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में ‘सेवा’ का संबंध व्यावसायिक गतिविधि से है। डीटीओ किसी नागरिक को निजी या व्यावसायिक लाभ के लिए सेवा नहीं बेचता, बल्कि कानून और सरकारी नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए वैधानिक जिम्मेदारी निभाता है। इसलिए डीटीओ और नागरिक के बीच उपभोक्ता तथा सेवा प्रदाता का संबंध स्थापित नहीं होता।

आयोग ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के सीजी गोयल बनाम कलेक्टर ऑफ स्टाम्प, दिल्ली मामले में 8 दिसंबर 2015 को दिए गए निर्णय का भी उल्लेख किया। आयोग के अनुसार, जब कोई सरकारी अधिकारी किसी अधिनियम के तहत अपने वैधानिक दायित्व का निर्वहन करता है, तो उसके काम में कथित देरी या कमी के खिलाफ उपभोक्ता आयोग में शिकायत नहीं की जा सकती।

प्रशासनिक लापरवाही का मामला, उचित माध्यम से शिकायत की सलाह

आयोग ने कहा कि मोटरसाइकिल का नामांतरण नहीं किया जाना, यदि नियमों के विपरीत या अनुचित देरी का मामला है, तो इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ‘डिफिशिएंसी इन सर्विस’ नहीं माना जा सकता। यह प्रशासनिक लापरवाही का विषय हो सकता है।

ऐसे मामले में शिकायतकर्ता को उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए संबंधित वरीय पदाधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए। इन्हीं आधारों पर आयोग ने वादी और डीटीओ के बीच उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत उपभोक्ता-सेवा प्रदाता संबंध स्थापित नहीं होने की बात कहते हुए वाद को उपभोक्ता विवाद नहीं माना।

Share this article

Facebook
Twitter X
WhatsApp
Telegram
 
October 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031