“भोजपुरी की आत्मा खोती जा रही है, इसलिए दर्शक दूर हो रहे हैं”
सिवान के होटल The Siwan International में अभिनेता विनोद मिश्रा से केएमपी भारत के बिहार हेड और सीवान के जानेमाने पत्रकार कृष्ण मुरारी पांडेय की खास बातचीत
सेलिब्रिटी इंटरव्यू l केएमपी भारत l पटना/सीवान
सिवान के Hotel The Siwan International में देर रात बातचीत का दौर चल रहा था। सामने बैठे थे भोजपुरी और हिंदी सिनेमा के चर्चित चरित्र अभिनेता Vinod Mishra। चेहरे पर वर्षों का अनुभव, आवाज में संघर्ष की गहराई और बातों में जिंदगी का लंबा सफर साफ झलक रहा था। https://youtube.com/shorts/ELAR0GqcIQY?si=s29cuz1-X_alZpy1
केएमपी भारत के बिहार हेड और सीवान के जाने माने पत्रकार कृष्ण मुरारी पांडेय से विशेष बातचीत में विनोद मिश्रा ने अपने फिल्मी जीवन, निजी संघर्ष, भोजपुरी सिनेमा के बदलते स्वरूप और नई पीढ़ी को लेकर खुलकर अपनी बातें रखीं।

सिवान जिले के जीरादेई प्रखंड के गंगौली गांव से निकलकर मुंबई तक का सफर तय करने वाले विनोद मिश्रा आज भोजपुरी और हिंदी सिनेमा में एक सम्मानित नाम हैं। उन्हें चरित्र अभिनेता की श्रेणी में प्रतिष्ठित “बेस्ट एक्टर” अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।
सवाल : हिंदी सिनेमा और अभिनय की दुनिया में कितना समय हो गया?
जवाब :
विनोद मिश्रा मुस्कुराते हुए कहते हैं — “पहली बार 1982 में मंच पर आया था। अब लगभग 30-35 साल से ज्यादा समय अभिनय की दुनिया में हो गया। मंच से शुरुआत हुई, फिर धीरे-धीरे फिल्मों तक पहुंचा।”
वे बताते हैं कि अभिनय उनके लिए सिर्फ पेशा नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है। बचपन से ही उन्हें लोगों की नकल करना, संवाद बोलना और मंच पर खुद को प्रस्तुत करना अच्छा लगता था। गांव के छोटे-छोटे कार्यक्रमों से शुरू हुआ सफर मुंबई के फिल्मी गलियारों तक पहुंच गया।
सवाल : संघर्ष के दिनों में सबसे कठिन समय कौन-सा रहा?

जवाब :
इस सवाल पर कुछ क्षण के लिए उनकी आंखें गंभीर हो जाती हैं। वे धीरे से कहते हैं —
“मेरे शुरुआती करियर के दौरान मेरे परिवार में ऐसी-ऐसी मौतें हुईं जिसने मुझे अंदर से तोड़ दिया। मेरे पिताजी, माताजी और बड़े भैया… इन सबको खोना मेरे जीवन का सबसे कठिन दौर था।”
वे बताते हैं कि जिंदगी ने उन्हें बहुत जल्दी भावनात्मक रूप से मजबूत बनने के लिए मजबूर कर दिया।
रात के करीब 10 बजे मेकअप रूम में टिशू पेपर से मेकअप उतारते हुए उन्होंने एक ऐसी बात कही जो जिंदगी का बड़ा दर्शन बन जाती है।
उन्होंने कहा —
“जीवन में आपको अपने नुकसान से कहीं ज्यादा नुकसान तब होता है, जब आपसे कोई रुष्ठ हो जाता है। फिर वह आपका कितना नुकसान कर देगा, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।”
उनकी यह बात सिर्फ फिल्मी दुनिया नहीं बल्कि सामान्य जीवन पर भी पूरी तरह लागू होती दिखती है।

सवाल : आज के दौर में बदलाव को आप कैसे देखते हैं?
जवाब :
विनोद मिश्रा कहते हैं —
“परिवर्तन संसार का नियम है। पहले पाली चिट्ठी आती थी, अब वीडियो कॉल आ रहा है। समय बदल रहा है और हमें भी बदलना सीखना होगा।”
वे नई पीढ़ी को लेकर भी बेहद सकारात्मक नजर आते हैं। उनका मानना है कि अगर बच्चों को आगे बढ़ाना है तो उनके विचारों को समझना जरूरी है।
उन्होंने गांव के पुराने दौर को याद करते हुए कहा —
“सोचिए, जब पहली लड़की ने साइकिल चलाई होगी तो गांव वालों की क्या प्रतिक्रिया रही होगी। लोग आश्चर्य से कहते थे — ‘हई देख लईकी साइकिल चलावतिया।’ लेकिन आज वही लोग गर्व महसूस करते हैं कि बेटियां आगे बढ़ रही हैं।”
वे कहते हैं कि समाज का हर बदलाव शुरुआत में विरोध झेलता है, लेकिन समय के साथ वही बदलाव सामान्य और प्रेरणादायक बन जाता है।

सवाल : भोजपुरी फिल्मों से दर्शक दूर क्यों हो रहे हैं?
जवाब :
इस सवाल पर विनोद मिश्रा बेहद गंभीर होकर भोजपुरी सिनेमा की स्थिति पर खुलकर बोलते हैं।
वे कहते हैं —
“हम 1999 से मुंबई में रह रहे हैं। आज भोजपुरी फिल्मों में काम करने वाले करीब 80 फीसदी लोग गैरभोजपुरी भाषी हैं। यही सबसे बड़ा कारण है कि भोजपुरी फिल्मों से भोजपुरी का मूल गायब होता जा रहा है।”
उनका मानना है कि भोजपुरी सिर्फ भाषा नहीं बल्कि एक संस्कृति, लय और भावनात्मक प्रस्तुति है।
वे कहते हैं —
“हमारी दादी-नानी जिस रोचकता से भोजपुरी बोलती थीं, उसे हम वीडियो में भी नहीं दिखा पा रहे हैं। भोजपुरी भाषा का प्रेजेंटेशन ही सबसे बड़ी कला है।”
विनोद मिश्रा के अनुसार आज तकनीक 4G, 5G और 8G की ओर बढ़ रही है, लेकिन भोजपुरी सिनेमा अपनी मूल पहचान को कमजोर करता जा रहा है।
वे कहते हैं कि भोजपुरी फिल्मों में मजबूत कहानी, प्रस्तुति और भाषा की आत्मा को बचाने की जरूरत है।
सवाल : क्या भोजपुरी फिल्मों का बजट भी एक बड़ी समस्या है?
जवाब :
वे बिना झिझक कहते हैं —
“भोजपुरी फिल्मों में बजट का अभाव बहुत बड़ी समस्या है। कई निर्माता जल्दी और सस्ते में फिल्म पूरी कर देना चाहते हैं। यही वजह है कि गुणवत्ता प्रभावित होती है।”
उनका मानना है कि जब तक भोजपुरी सिनेमा अपनी तकनीक, लेखन और प्रस्तुति पर गंभीरता से काम नहीं करेगा, तब तक दर्शकों का भरोसा पूरी तरह वापस नहीं आएगा।
वे यह भी कहते हैं कि दर्शक अब बहुत जागरूक हो चुके हैं। ओटीटी और सोशल मीडिया के दौर में लोग अच्छी कहानी और बेहतर प्रस्तुति चाहते हैं।

सवाल : युवा कलाकारों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब :
विनोद मिश्रा कहते हैं —
“एक कलाकार की असली पहचान उसकी मेहनत, अनुशासन और किरदार के प्रति समर्पण से बनती है।”
वे नए कलाकारों को सलाह देते हैं कि सिर्फ प्रसिद्धि के पीछे नहीं भागना चाहिए। अभिनय एक साधना है और इसमें धैर्य सबसे बड़ी ताकत होती है।
उनका कहना है कि कलाकार को हमेशा सीखते रहना चाहिए। मंच, थिएटर और साहित्य से जुड़ाव अभिनय को मजबूत बनाता है।
गांव से मुंबई तक का सफर बना प्रेरणा
सिवान के गंगौली गांव से निकलकर फिल्मी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले विनोद मिश्रा आज उन कलाकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने संघर्ष को अपनी ताकत बनाया।
उन्होंने अपने जीवन में निजी दुख, आर्थिक संघर्ष और फिल्मी दुनिया की कठिनाइयों को बहुत करीब से देखा, लेकिन कभी हार नहीं मानी।
उनकी बातचीत में एक अनुभवी कलाकार की संवेदनशीलता, गांव की मिट्टी की खुशबू और जीवन के गहरे अनुभव साफ महसूस होते हैं।
भोजपुरी सिनेमा को फिर चाहिए अपनी मिट्टी की खुशबू
बातचीत खत्म होते-होते रात काफी हो चुकी थी, लेकिन विनोद मिश्रा की बातें लंबे समय तक सोचने पर मजबूर करती हैं।
वे बार-बार भोजपुरी की आत्मा, उसकी मिठास और उसकी मौलिकता की बात करते हैं। शायद यही वजह है कि उनकी बातें सिर्फ एक अभिनेता का इंटरव्यू नहीं लगतीं, बल्कि भोजपुरी समाज और संस्कृति की चिंता भी महसूस कराती हैं।
भोजपुरी सिनेमा आज तकनीक और बाजार के बड़े दौर में खड़ा है, लेकिन विनोद मिश्रा मानते हैं कि अगर उसे लंबे समय तक टिकना है तो उसे अपनी जड़ों से फिर जुड़ना होगा।






