BHU: रामत्व से विश्व संस्कृति तक भारत की जय-यात्रा का संदेश, बीएचयू में राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

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विद्वानों ने कहा- श्रीराम के त्याग, सत्य, मर्यादा और लोकमंगल के आदर्श आज भी प्रासंगिक; नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत

डिजिटल न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l वाराणसी

संवाददाता l वाराणसी।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के भारत अध्ययन केन्द्र एवं भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शनिवार को समापन हुआ। “भारतीय संस्कृति की जय-यात्रा और रामत्व की प्रतिष्ठा (वाल्मीकि, तुलसीदास और कुबेरनाथ राय के साहित्य के विशेष संदर्भ में)” विषय पर आयोजित संगोष्ठी के दूसरे एवं सम्पूर्ति दिवस में चार तकनीकी सत्र हुए। देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से पहुंचे विद्वानों ने रामकथा की परंपरा, राष्ट्रनिर्माण, आधुनिक जीवन-मूल्यों, भारतीय इतिहास-दृष्टि और शिक्षा-संस्कृति में श्रीराम के आदर्शों की प्रासंगिकता पर विचार रखे।

रामकथा, राष्ट्रनिर्माण और जीवन-मूल्यों पर चर्चा

तीसरे तकनीकी सत्र में “भारतीय साहित्य में रामकथा की परम्परा, राष्ट्रनिर्माण और रामत्व” विषय पर वक्ताओं ने भारतीय साहित्य में रामकथा की निरंतरता और राष्ट्रनिर्माण में रामत्व की भूमिका को रेखांकित किया। चौथे सत्र में “रामत्व और आधुनिक जीवन-मूल्य” विषय पर चिकित्साशास्त्र, प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने वर्तमान समय में मानवीय जीवन-मूल्यों को मजबूत करने में रामकथा की भूमिका पर विचार रखे।

पांचवें तकनीकी सत्र में “भारतीय इतिहास दृष्टि और रामकथा”, जबकि छठे सत्र में “भविष्योन्मुखी विमर्श- शिक्षा, समाज और संस्कृति में राम के आदर्श” विषय पर चर्चा हुई। विद्वानों ने कहा कि रामकथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी व्यापक परंपरा है। समानांतर सत्रों में अध्यापकों एवं शोधार्थियों ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

त्याग, सत्य और शीलता का प्रतीक है रामत्व

सम्पूर्ति सत्र की अध्यक्षता प्रो. के.के. सिंह ने की। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के संदर्भ में भारत की महिमा को अनंत समुद्र के समान बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति की दीर्घ और अखंड परंपरा ने भारत के साथ-साथ विश्व के चिंतन को भी प्रभावित किया है। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास और आधुनिक युग के रचनाकार कुबेरनाथ राय के योगदान को रेखांकित किया।

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उन्होंने कहा कि रामकथा से जुड़ी आधुनिक व्याख्याएं प्राचीन रामपरंपरा को नए संदर्भों में समझने का अवसर देती हैं। राम की महिमा और भारतीय संस्कृति की इस जय-यात्रा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे विमर्श आवश्यक हैं।

प्रो. देवशंकर नवीन ने कहा कि श्रीराम ने त्याग, सत्य और शीलता के माध्यम से जिस रामत्व का आदर्श प्रस्तुत किया, वर्तमान समय में मनुष्य को उसे अपने जीवन में अपनाने की आवश्यकता है। इससे भारतीय संस्कृति की परंपरा और मजबूत होगी।

सभ्यता शरीर तो संस्कृति उसकी आत्मा : प्रो. बिहारी लाल शर्मा

मुख्य अतिथि प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि सभ्यता यदि शरीर है तो संस्कृति उसकी आत्मा है। भारत की साधना सदियों से आत्मबोध और सांस्कृतिक जागरण की रही है। भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना, अनुशासन, त्याग और लोकमंगल की वैचारिक परंपरा है।

उन्होंने कहा कि रामत्व किसी एक महापुरुष तक सीमित नहीं है, बल्कि उन मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों का समुच्चय है, जो व्यक्ति को मर्यादित और समाज को समन्वित करते हैं। श्रीराम के जीवन में धृति, क्षमा, दम, शौच, इंद्रियनिग्रह, विद्या, सत्य और अक्रोध जैसे धर्म के लक्षण दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब दुनिया विकास के साथ शांति की तलाश कर रही है, तब भारत और काशी रामत्व के माध्यम से विकास, संस्कृति और लोकमंगल का मार्ग प्रस्तुत कर सकते हैं।

राम की यात्रा अयोध्या से विश्व-संस्कृति तक : प्रो. श्रीकिशोर मिश्र

सारस्वत अतिथि प्रो. श्रीकिशोर मिश्र ने श्रीराम को भारतीय चेतना में सार्वभौम आदर्श के रूप में स्थापित बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य ने श्रीराम के आचरण को आदर्श मानते हुए उन्हें धर्म, लोकमंगल, आदर्श आचरण और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक माना है। उन्होंने कहा कि राम की यात्रा केवल अयोध्या से लंका तक की यात्रा नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति से विश्व-संस्कृति तक पहुंचने वाली विचार-यात्रा है।

विद्वानों के विचारों से समृद्ध हुआ आयोजन

सम्पूर्ति सत्र में प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी, समन्वयक, भारत अध्ययन केन्द्र, बीएचयू ने सभी विद्वानों का स्वागत किया। डॉ. प्रियंका सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग ने धन्यवाद ज्ञापन किया। संगोष्ठी संयोजक डॉ. ज्ञानेन्द्र नारायण राय ने सेमिनार प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जबकि सत्र संयोजन डॉ. अमित कुमार पांडेय ने किया। विद्वानों के विचार-विमर्श और शोध-पत्र प्रस्तुतियों के साथ संगोष्ठी का सफलतापूर्वक समापन हुआ।

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