Assam Culture: हर साल दशहरा में सिर्फ 6 दिन ही खुलता है जागीरोड का विशाल दुर्गा मंदिर, बाकी साल रहता है बंद

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प्रतिमा विसर्जन के बाद फिर लग जाता है ताला, दशहरा में बाहर से आते हैं पुजारी; छह दिनों तक लगता है भव्य मेला

सफरनामा न्यूज डेस्क l केएमपी भारत l असम

कृष्ण मुरारी पांडेय l जागीरोड (गुवाहाटी)।

गुवाहाटी के जागीरोड में शिशु एवं पब्लिक फील्ड के ठीक सामने स्थित विशाल दुर्गा मंदिर अपने आप में अनोखी धार्मिक परंपरा को संजोए हुए है। आमतौर पर मंदिरों में वर्षभर पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन जागीरोड का यह मंदिर साल में केवल दशहरा में 6 दिनों के लिए खुलता है। इन छह दिनों में यहां श्रद्धा, आस्था और उत्सव का ऐसा संगम देखने को मिलता है कि पूरा इलाका भक्तिमय हो उठता है। https://youtube.com/shorts/dcZbGCxK7GQ?si=7oaX9qHREkMaFbiw

स्थानीय लोगों के अनुसार यह जागीरोड का सबसे बड़ा दुर्गा मंदिर है। दशहरा के अवसर पर यहां भव्य पूजा का आयोजन होता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है। मेले में दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं। बच्चों के लिए झूले और मनोरंजन के साधनों से लेकर खाने-पीने और जरूरत की विभिन्न वस्तुओं की दुकानें सजती हैं। छह दिनों तक मंदिर के आसपास का माहौल पूरी तरह उत्सव में बदल जाता है।

वर्षभर नहीं रहता कोई पुजारी

मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां वर्षभर कोई स्थायी पुजारी नहीं रहता। सामान्य दिनों में मंदिर बंद रहता है। हालांकि स्थानीय श्रद्धालु कभी-कभार मंदिर के पास आकर दिया-बाती कर लेते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं। लेकिन नियमित रूप से पूजा कराने के लिए कोई पुजारी नियुक्त नहीं है।

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दशहरा आने पर मंदिर के कपाट खोले जाते हैं। पूजा-अर्चना के लिए बाहर से पुजारी बुलाए जाते हैं। मंदिर कमेटी के सदस्य भी इस दौरान सक्रिय हो जाते हैं और पूजा की पूरी व्यवस्था संभालते हैं। विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा होती है। छह दिनों तक यहां धार्मिक कार्यक्रमों के साथ मेले की रौनक बनी रहती है।

विसर्जन के बाद फिर बंद हो जाता है मंदिर

दशहरा के अंतिम दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का धूमधाम से विसर्जन किया जाता है। प्रतिमा विसर्जन के साथ ही छह दिनों तक चलने वाला धार्मिक उत्सव समाप्त हो जाता है। इसके बाद मंदिर की साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाएं पूरी कर एक बार फिर मंदिर के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया जाता है। फिर अगले वर्ष दशहरा आने का इंतजार शुरू हो जाता है।

स्थानीय लोगों के लिए यह परंपरा वर्षों से आस्था का हिस्सा बनी हुई है। उनका कहना है कि मंदिर का वर्षभर बंद रहना भले ही दूसरे मंदिरों से अलग है, लेकिन दशहरा के छह दिनों में यहां जिस तरह श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, उससे मंदिर की धार्मिक महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

स्थानीय लोगों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र

जागीरोड निवासी कृष्णा सिंह, पुत्र सुमति देवी और धर्मदेव सिंह, बताते हैं कि दशहरा के समय इस मंदिर में पूजा पूरे उत्साह के साथ होती है। उनके अनुसार मंदिर में सामान्य दिनों में कोई पुजारी नहीं रहता। स्थानीय लोग जब कभी आते हैं तो अपनी श्रद्धा से दिया-बाती कर लेते हैं। दशहरा के समय बाहर से पुजारी आते हैं और मंदिर कमेटी के लोग मिलकर पूजा की व्यवस्था करते हैं।

कृष्णा सिंह के मुताबिक प्रतिमा विसर्जन के बाद मंदिर को फिर बंद कर दिया जाता है। अगले वर्ष दशहरा के समय ही मंदिर को दोबारा खोला जाता है। उनके अनुसार दशहरा के दौरान यहां लगने वाला मेला जागीरोड के सबसे बड़े मेलों में माना जाता है और आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होने पहुंचते हैं।

धार्मिक परंपरा, विशाल मेला और वर्ष में केवल छह दिनों के लिए खुलने की वजह से जागीरोड का यह दुर्गा मंदिर स्थानीय लोगों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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