प्रेमचंद के साहित्य में फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की स्पष्ट अनुगूंज
कवि सम्मेलन व मुशायरे में रचनाकारों ने बांधा समां
साहित्य संस्कृति न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l पटना
संवाददाता l सीवान।
जनवादी लेखक संघ (जलेस) सीवान के तत्वावधान में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती स्थानीय कन्हैयालाल जिला केन्द्रीय पुस्तकालय के सभागार में मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता जलेस के कार्यकारी अध्यक्ष युगल किशोर दूबे ने की।

कार्यक्रम की शुरुआत साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने मुंशी प्रेमचंद के तैल चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि देने के साथ की। इसके बाद ‘वर्तमान फासीवादी दौर में प्रेमचंद साहित्य’ विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित की गई।


गोष्ठी में आलेख प्रस्तुत करते हुए अरुण कुमार सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर असहिष्णुता तथा फासीवादी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं। प्रेमचंद तानाशाही, फासीवाद, पूंजीवाद और सामंती व्यवस्था के सख्त विरोधी थे।

उनके साहित्य में इन व्यवस्थाओं के खिलाफ संघर्ष की स्पष्ट अनुगूंज दिखाई देती है। वे आम जनता को मानसिक गुलामी से मुक्त करना चाहते थे और इसके लिए शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मानते थे।

वरिष्ठ अधिवक्ता रविन्द्र सिंह ने कहा कि आज हम नव-फासीवाद के दौर में जी रहे हैं। इसमें शासन सीधे तौर पर नहीं, बल्कि संस्थाओं पर कब्जा कर दमनकारी नीतियों के माध्यम से संचालित किया जाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। उन्हें व्यवस्था के खिलाफ हर स्तर पर लोकतांत्रिक आंदोलन में सहयोग करना चाहिए।
हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. हारुन शैलेन्द्र ने कहा कि फासीवाद लोकतंत्र के ठीक विपरीत व्यवस्था है, जहां दूसरे विचारों के लिए कोई स्थान नहीं होता। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती को जरूरी बताते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को अपनी भूमिका निभानी होगी।

प्रो. डॉ. महमूद हसन अंसारी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में स्वाधीनता का स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। सरकार का काम आम जनता की भलाई करना होना चाहिए, न कि उसका दमन। धर्म और संप्रदाय के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
गोष्ठी में कमलेश्वर ओझा, अजय कुमार सिंह, रमेश उपाध्याय, धीरेन्द्र पांडेय, प्रो. उपेन्द्र नाथ यादव सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे।

कवि सम्मेलन और मुशायरे में रचनाओं ने बांधा समां
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें कवियों और शायरों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को भाव-विभोर किया। वरिष्ठ शायर मेराज तशना की पंक्तियां- “सुलगती धूप में जिसके लिए मैं घर बनाता हूं, वही छुटी हुई मेरी चटाई छीन लेता है” को खूब सराहा गया।
अरशद सीवानी की गजल “फन का जो मजदूर होता तो सोरवनवर होता, ईंट इफकार की ढोता तो सोरवनवर होता” ने भी श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी। वहीं गुलाम सरवर हाशमी की रचना “मुंह से निकली हुई हर बात से डर लगता है, मुझको बिगड़े हुए हालात से डर लगता है…” वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक लगी।

नूर सुलतानी के शेर “हमें अपनी विरासत की हिफाजत खुद ही करनी है, मुहाफिज हर घड़ी हो ऐसा नहीं होता” को भी श्रोताओं ने सराहा। एकराम हुसैन की रचना “महल ईमान का ढाया जा रहा है, निशान-ए-हक मिटाया जा रहा है” पर जमकर तालियां बजीं।

कार्यक्रम का संचालन जलेस के जिला सचिव मार्कण्डेय ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. उपेन्द्र नाथ यादव ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में सुबोध कुमार, पवन पांडेय, भोगेंद्र झा, डॉ. लालजी नारायण, हैदर वारसी, दया शंकर द्विवेदी सहित अन्य लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।






