“KMP भारत के न्यूज एडिटर कृष्ण मुरारी पांडेय से तपन भौमिक उर्फ ‘तपन दा’ की विशेष बातचीत”
तपन भौमिक उर्फ तपन दा ने बताया—पहाड़ी इलाकों में फ्रेश मछली की सीमित उपलब्धता ने बढ़ाई है ड्राई फिश की मांग, आंध्र से गुजरात और यूपी-बिहार से बंगाल तक से पहुंचता है माल; पहाड़ी राज्यों में बनता है रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा

एशिया की सबसे बड़ी ड्राई फिश मंडी जागीरोड: यहां सूखती नहीं, ‘संवरती’ है मछली की किस्मत, तपन दा ने खोले जागीरोड की मशहूर ड्राई फिश मंडी के कारोबार के राज
सफरनामा न्यूज डेस्क l केएमपी भारत l गुवाहाटी
कृष्ण मुरारी पांडेय l जागीरोड (असम)।
मछली का नाम सुनते ही आमतौर पर आंखों के सामने ताजी मछली की तस्वीर आती है। लेकिन असम के मोरीगांव जिले का जागीरोड ऐसा बाजार है, जहां मछली की पहचान उसकी ताजगी से नहीं, बल्कि उसके लंबे समय तक सुरक्षित रहने और अलग स्वाद से होती है। यहां लगने वाली ड्राई फिश मंडी को एशिया की सबसे बड़ी सूखी मछली मंडियों में गिना जाता है। करीब 30 एकड़ में फैले इस बाजार में देश के अलग-अलग हिस्सों से सूखी मछलियां पहुंचती हैं और फिर नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों तक जाती हैं। शोध अध्ययनों में यहां 170 से अधिक दुकानों और करीब 300 प्रकार के ड्राई फिश उत्पादों का उल्लेख है। https://youtube.com/shorts/mJBCs-2MfeE?si=GeAklRFdZ30CHtcH

जागीरोड के चर्चित ड्राई फिश कारोबारी तपन भौमिक उर्फ ‘तपन दा’ से विशेष बातचीत में इस कारोबार की पूरी कहानी सामने आई।

गुजरात से बंगाल और यूपी-बिहार तक से आता है माल
तपन दा बताते हैं कि जागीरोड की मंडी में ड्राई फिश किसी एक इलाके की देन नहीं है। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा समेत देश के कई राज्यों से यहां सूखी मछली पहुंचती है। शोध अध्ययनों में भी गुजरात, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और ओडिशा सहित विभिन्न राज्यों से ड्राई फिश की आपूर्ति का उल्लेख मिलता है।
यहां आने के बाद मछली की किस्म, गुणवत्ता और आकार के अनुसार उसकी छंटाई होती है। इसके बाद यही माल मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और सिक्किम सहित पूर्वोत्तर के विभिन्न हिस्सों में पहुंचता है।
पहाड़ों में ड्राई फिश सिर्फ स्वाद नहीं, जरूरत भी
तपन दा कहते हैं, “नॉर्थ-ईस्ट का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र है। कई जगह ताजी मछली को नियमित रूप से पहुंचाना आसान नहीं होता। ऐसे में ड्राई फिश लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है और लोगों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।”
यही वजह है कि मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा जैसे राज्यों में इसकी मांग लगातार बनी रहती है। पूर्वोत्तर भारत में ड्राई फिश को दैनिक भोजन और खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जाने की बात शोध अध्ययनों में भी सामने आई है।
पानी ज्यादा तो भाव गिरता है, सीजन बदला तो कीमत चढ़ती है
ड्राई फिश कारोबार की सबसे बड़ी खासियत इसका बदलता बाजार भाव है। तपन दा के मुताबिक, “ड्राई फिश का कोई एक फिक्स रेट नहीं होता। जिस सीजन में पानी ज्यादा हो जाता है और मछली की उपलब्धता बढ़ती है, उस समय भाव काफी नीचे आ जाता है। इसके उलट जब उपलब्धता कम होती है तो कीमत बढ़ जाती है।”
शोध में भी जागीरोड में ड्राई फिश की कीमत को मछली की किस्म, परिवहन लागत, भंडारण और अन्य कारोबारी खर्चों से प्रभावित बताया गया है।
फ्रेश फिश कुछ समय में खराब, ड्राई फिश बनी लंबे सफर की साथी
तपन दा बताते हैं कि मछली को सुखाने की परंपरा दरअसल संरक्षण की पुरानी तकनीक है। पानी की मात्रा कम होने से इसे लंबे समय तक रखा और दूर-दराज के इलाकों में पहुंचाया जा सकता है।
उनके मुताबिक, “लोग इसे ऐसे समझते हैं जैसे ड्राई फ्रूट घर में रखकर जरूरत के अनुसार खाया जाता है। ड्राई फिश भी खरीदकर घर में रखी जाती है और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल होती है।”
पुराने अध्ययन भी बताते हैं कि जागीरोड में मछली को सुखाने के बाद उसकी छंटाई और गुणवत्ता के अनुसार वर्गीकरण किया जाता है तथा फिर अलग-अलग बाजारों तक भेजा जाता है।

300 से ज्यादा किस्मों का कारोबार, समुद्री से लेकर मीठे पानी की मछलियां
जागीरोड की मंडी की खासियत सिर्फ इसका आकार नहीं, बल्कि यहां मिलने वाली मछलियों की विविधता भी है। शोध में 300 से अधिक प्रकार के ड्राई फिश उत्पादों का उल्लेख मिलता है। इनमें मीठे पानी और समुद्री दोनों प्रकार की मछलियां शामिल हैं।
बोमला, केस्की, मैकेरल, इलिश, मुआ, बामी, तिलापिया सहित कई किस्में यहां कारोबार का हिस्सा हैं। अलग-अलग किस्म की मछलियों की मांग उनके स्वाद, आकार, गुणवत्ता और स्थानीय पसंद के अनुसार बदलती रहती है।
मलेरिया में कारगर होने की मान्यता, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी
तपन दा कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर कुछ लोग ड्राई फिश की कुछ किस्मों को मलेरिया में लाभकारी मानते हैं। पुराने बाजार-अध्ययनों में भी ‘सिंडल’ नाम की एक सूखी मछली के बारे में स्थानीय लोगों की ऐसी मान्यता दर्ज की गई है। हालांकि, मलेरिया के इलाज के लिए ड्राई फिश को प्रमाणित चिकित्सा उपचार नहीं माना जाना चाहिए और बीमारी होने पर चिकित्सकीय इलाज जरूरी है।
सिर्फ बाजार नहीं, हजारों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया
जागीरोड की ड्राई फिश मंडी एक व्यापारिक केंद्र होने के साथ-साथ रोजगार का बड़ा स्रोत भी है। उपलब्ध अध्ययनों में बाजार से करीब 4,000 लोगों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आजीविका जुड़ी होने का उल्लेख मिलता है। महिलाओं की भी कारोबार, थोक बिक्री और मजदूरी में भागीदारी दर्ज की गई है।
यानी जागीरोड की यह मंडी सिर्फ सूखी मछली नहीं बेचती। यह असम को पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों से जोड़ने वाली एक बड़ी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला है।
तपन दा की बातों में इस पूरे कारोबार का सार छिपा है—मछली जहां ताजा रहना मुश्किल है, वहां उसे सुखाकर स्वाद, रोजगार और व्यापार की लंबी यात्रा पर भेज दिया जाता है। जागीरोड इसी परंपरा का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।
जागीरोड की ड्राई फिश मंडी का कारोबार कितना बड़ा है?
प्रस्तुत है KMP भारत के न्यूज एडिटर कृष्ण मुरारी पांडेय से ड्राई फिश के चर्चित कारोबारी तपन भौमिक उर्फ ‘तपन दा’ की खास बातचीत के प्रमुख अंश

सवाल: तपन दा, जागीरोड की ड्राई फिश मंडी को इतना खास क्यों माना जाता है?
तपन दा: जागीरोड ड्राई फिश का बहुत बड़ा कारोबारी केंद्र है। यहां देश के कई राज्यों से सूखी मछली आती है और फिर पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों में भेजी जाती है। यहां का कारोबार काफी पुराना और व्यापक है।
सवाल: किन-किन राज्यों से ड्राई फिश जागीरोड पहुंचती है?
तपन दा: आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा समेत कई राज्यों से माल यहां पहुंचता है। अलग-अलग जगह की मछलियों की अपनी खासियत और मांग होती है।
सवाल: पूर्वोत्तर में ड्राई फिश की इतनी मांग क्यों है?
तपन दा: पूर्वोत्तर के कई इलाके पहाड़ी और दुर्गम हैं। वहां हर जगह फ्रेश मछली आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती। इसलिए मछली को सुखाकर सुरक्षित रखा जाता है और लंबे समय तक इस्तेमाल किया जाता है। मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में इसकी खास मांग है।
सवाल: क्या ड्राई फिश सिर्फ जरूरत है या स्वाद के लिए भी पसंद की जाती है?
तपन दा: दोनों। इसका स्वाद फ्रेश मछली से अलग होता है। जिन लोगों को इसकी आदत है, वे इसे बहुत पसंद करते हैं। कई परिवार इसे घर में स्टॉक करके रखते हैं और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करते हैं।
सवाल: ड्राई फिश का बाजार भाव कैसे तय होता है?
तपन दा: इसका कोई एक फिक्स रेट नहीं होता। मछली की उपलब्धता, सीजन, गुणवत्ता और मांग के हिसाब से भाव बदलता रहता है। जिस समय पानी ज्यादा होता है और मछली की उपलब्धता बढ़ती है, उस समय कई किस्मों के भाव नीचे आ जाते हैं। उपलब्धता कम होने पर भाव बढ़ सकते हैं।
सवाल: फ्रेश मछली की तुलना में ड्राई फिश का सबसे बड़ा फायदा क्या है?
तपन दा: सबसे बड़ा फायदा यही है कि इसे सुरक्षित रखकर बाद में इस्तेमाल किया जा सकता है। फ्रेश मछली जल्दी खराब हो सकती है, जबकि अच्छी तरह सुखाई गई मछली लंबे समय तक रखी जा सकती है। यही वजह है कि पहाड़ी और दूर-दराज के इलाकों में इसकी उपयोगिता ज्यादा है।
सवाल: जागीरोड मंडी में कितनी तरह की ड्राई फिश मिलती है?
तपन दा: यहां बहुत सारी किस्में मिलती हैं। छोटी-बड़ी, समुद्री और मीठे पानी की अलग-अलग मछलियां आती हैं। ग्राहकों की पसंद और इलाके के हिसाब से हर किस्म की अपनी मांग है।
सवाल: क्या गरीब परिवारों के लिए भी यह महत्वपूर्ण भोजन है?
तपन दा: हां, स्थानीय लोग इसे सस्ता और लंबे समय तक चलने वाला भोजन मानते हैं। कम मात्रा में भी यह खाने का स्वाद बढ़ा देता है और इसे घर में सुरक्षित रखकर जरूरत के समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
सवाल: आपने मलेरिया में ड्राई फिश के फायदे की बात कही। इस बारे में क्या मान्यता है?
तपन दा: हमारे यहां कुछ लोग ऐसी मान्यता रखते हैं कि कुछ खास सूखी मछलियां बीमारी के समय उपयोगी होती हैं। यह स्थानीय अनुभव और मान्यता की बात है। बीमारी में डॉक्टर की सलाह और उचित इलाज जरूरी है।
सवाल: अंत में, जागीरोड की ड्राई फिश मंडी को आप एक वाक्य में कैसे बताएंगे?
तपन दा: यह सिर्फ मछली का बाजार नहीं है। यह देश के अलग-अलग हिस्सों को पूर्वोत्तर की रसोई से जोड़ने वाला बड़ा कारोबारी केंद्र है। यहां आने वाली सूखी मछली स्वाद के साथ हजारों लोगों की रोजी-रोटी से भी जुड़ी है।






