आईफा की नटराज कला वीथिका में 46 कलाकृतियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन, देशभर के कलाकारों और विद्वानों की रही गरिमामयी मौजूदगी
डिजिटल न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l वाराणसी
सेवंवाददाता l वाराणसी।
संगीत और चित्रकला के अद्भुत समन्वय को साकार करती ‘संगीतांजलि चित्रकला प्रदर्शनी’ का भव्य आयोजन इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स (आईफा), वाराणसी की नटराज कला वीथिका में किया गया। यह प्रदर्शनी इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स, नागरी नाटक मंडली, अभ्युदय तथा संस्कार भारती (विश्वविद्यालय इकाई), वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगीतांजलि कार्यशाला में तैयार की गई कलाकृतियों पर आधारित रही। प्रदर्शनी में कलाकारों ने संगीत के विभिन्न स्वरूपों, भावों और लय को रंगों एवं तूलिका के माध्यम से जीवंत रूप में प्रस्तुत कर कला प्रेमियों को आकर्षित किया।

प्रदर्शनी का शुभारंभ 4 अगस्त 2026 को पूर्वाह्न 11 बजे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से पधारे डॉ. मानस साहू, डॉ. हरिओम हरि, डॉ. जितेश गढ़पायले तथा डॉ. प्रेम शंकर सिंह (प्रयागराज) ने दीप प्रज्वलित कर किया। उद्घाटन समारोह की शुरुआत संस्थान के गायन विभाग के विद्यार्थियों द्वारा विश्वविद्यालय कुलगीत की मनोहारी प्रस्तुति से हुई, जिसने पूरे वातावरण को सांगीतिक ऊर्जा से भर दिया।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने सभी अतिथियों का अंगवस्त्र एवं पुष्पगुच्छ भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। इसके बाद अपने संबोधन में इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स के निदेशक डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन युवा कलाकारों को अपनी सृजनात्मक क्षमता प्रदर्शित करने के लिए प्रभावी मंच उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने कहा कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करने का भी महत्वपूर्ण साधन है।


इस अवसर पर वक्ताओं ने भारतीय संगीत की परिभाषा “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते” का उल्लेख करते हुए कहा कि संगीत केवल श्रवण का विषय नहीं, बल्कि अनुभूति का भी माध्यम है। चित्रकारों ने इसी अनुभूति को रंगों, रेखाओं और कल्पनाशीलता के माध्यम से कैनवास पर उतारने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि संगीत के सुर, ताल, भाव और लय को चित्रों में अभिव्यक्त करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होने के साथ-साथ एक उच्च कोटि की कलात्मक साधना भी है।
प्रदर्शनी में कुल 46 कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गईं, जिनमें भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोक परंपराओं, नृत्य मुद्राओं और सांगीतिक भावों को अत्यंत आकर्षक ढंग से चित्रित किया गया। प्रदर्शनी देखने पहुंचे दर्शकों, कला प्रेमियों और विद्यार्थियों ने कलाकारों की कल्पनाशीलता तथा रंग संयोजन की मुक्त कंठ से सराहना की। अनेक आगंतुकों ने इसे संगीत और चित्रकला के समन्वय का अनूठा उदाहरण बताया।
कार्यक्रम में पंडित पूरन महाराज, विदुषी सुचरिता गुप्ता, प्रो. सरोज रानी, प्रो. ऋचा कुमार, पंडित देबाशीष दे, डॉ. रागिनी सरना, डॉ. शारदा सिंह, डॉ. शुभ्रा वर्मा, श्री गुंजन शुक्ल, डॉ. ममता टंडन, शुभांगी सिंह, डॉ. संदीप केवले, श्री अंकित सिंह सहित कला एवं संगीत जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। वहीं संस्थान के शिक्षक विकास सिंह, विनीता नागर, सुशांत सिंह, धनेश सिंह के साथ बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ, गणमान्य नागरिक और कला प्रेमी भी मौजूद रहे। पूरे आयोजन ने वाराणसी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और कला के प्रति लोगों की गहरी रुचि को एक बार फिर सशक्त रूप से प्रदर्शित किया।






