इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स में ‘गुरु प्रणाम’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन, टैगोर के कला-साहित्य और काशी से रिश्ते पर हुई विशेष चर्चा
सेंट्रल न्यूज़ डेस्क l केएमपी भारत l वाराणसी
कृष्ण मुरारी पांडेय l वाराणसी।
घमहापुर, गंगापुर स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स (आईएफए) में शुक्रवार को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती “गुरु प्रणाम” कार्यक्रम के रूप में अत्यंत गरिमामय वातावरण में मनाई गई। कार्यक्रम का आयोजन इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स, संस्कार भारती विश्वविद्यालय इकाई एवं मुक्तांगन, त्रिवेंद्रम के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। पूरे आयोजन में गुरुदेव की कला, साहित्य, संगीत और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके योगदान को भावपूर्ण ढंग से याद किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत गुरुदेव के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर हुई। इसके बाद संस्थान के निदेशक डॉ. अवधेश कुमार सिंह ने पावर प्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से गुरुदेव के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके रचनात्मक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से टैगोर की चित्रकला शैली, उनके सौंदर्यबोध और कलात्मक दृष्टिकोण की चर्चा करते हुए बताया कि गुरुदेव केवल साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक अद्वितीय चित्रकार और सांस्कृतिक द्रष्टा भी थे।
डॉ. सिंह ने कहा कि गुरुदेव का उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से काशी से गहरा संबंध रहा है। उन्होंने बताया कि टैगोर के पूर्वज लगभग एक हजार वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के कन्नौज से कोलकाता गए थे। साथ ही गुरुदेव भारत कला भवन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पद से भी जुड़े रहे। इस जानकारी ने विद्यार्थियों और उपस्थित कला प्रेमियों को गुरुदेव के जीवन के कम चर्चित पहलुओं से परिचित कराया।
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक क्षण तब आया, जब शांतिनिकेतन की सांगीतिक परंपरा को जीवंत करते हुए श्रीमती अभ्रदिता मैत्रा बनर्जी ने सुमधुर रवींद्र संगीत की प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति ने सभागार को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ऊर्जा से भर दिया। श्रोताओं ने मंत्रमुग्ध होकर रवींद्र संगीत का आनंद लिया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने गुरुदेव के रचनात्मक संसार के कई अनछुए पहलुओं को भी सामने रखा। बताया गया कि टैगोर ने लगभग दो हजार से अधिक गीतों की रचना की थी। उनके गीतों, जिन्हें “रवींद्र संगीत” के नाम से जाना जाता है, के विकास में उनके परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। धुनों के निर्माण में उनके भाई, भतीजे और भतीजियों का योगदान उल्लेखनीय था। यह भी जानकारी दी गई कि उनका पहला गीतिनाट्य ‘भानु सिंघेर पदाबोली’ बांग्ला भाषा में नहीं, बल्कि मैथिली और संस्कृत में रचित था। गुरुदेव ने प्रारंभिक लेखन “भानुसिंह” नाम से किया था, जबकि परिवार में उन्हें स्नेहपूर्वक “रवि” कहकर पुकारा जाता था।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में ‘लवली रिज्यूमे’ नामक चलचित्र का प्रदर्शन किया गया। लगभग एक घंटे की इस फिल्म में काशी की समृद्ध कला और सांस्कृतिक परंपरा को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया। फिल्म के निर्देशक एवं लेखक मितेश गुप्ता ‘पौरुषेय’ हैं। चलचित्र में गौरव जोशी, सोनाली शर्मा, बाल मुकुंद त्रिपाठी एवं उमेश भाटिया ने प्रभावशाली अभिनय किया। फिल्म प्रदर्शन के बाद निर्देशक मितेश गुप्ता को अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. अनिल कुमार सिंह ने सभी अतिथियों, कलाकारों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजन में अविनाश पाण्डेय, विवेक कुमार, आयुष तिवारी, विकास सिंह, विनीता नगर, धनेश सिंह, सुशांत सिंह और सजल कुमार सहित आईएफए के शिक्षकगण और विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही। पूरे आयोजन ने कला, संस्कृति और भारतीय चिंतन की समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सार्थक संदेश दिया।






