Varanasi Arts: शिक्षा में रंगमंच की भूमिका पर मंथन: काशी के कलाकार बोले— थिएटर से होगा छात्रों का सर्वांगीण विकास

Share

आईएफए में हुई परिचर्चा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत रंगमंच और दृश्य कलाओं के समन्वय पर हुई चर्चा

सेंट्रल डेस्क l केएमपी भारत l वाराणसी

संवाददाता l वाराणसी। शिक्षा और रंगमंच के संबंधों को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के संदर्भ में समझने और उसके व्यापक प्रभावों पर विचार करने के उद्देश्य से बुधवार को इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स (आईएफए), घमहापुर गंगापुर में एक महत्वपूर्ण परिचर्चा का आयोजन किया गया। “शिक्षा एवं रंगमंच : एन.ई.पी. के विशेष संदर्भ में” विषयक इस कार्यक्रम का आयोजन इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स, वाराणसी; संस्कार भारती विश्वविद्यालय इकाई एवं मुक्तांगन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ एवं समकालीन रंगकर्मियों, शिक्षकों, कलाकारों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

कार्यक्रम की शुरुआत इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स के निदेशक डॉ. अवधेश कुमार सिंह के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने सभी अतिथियों एवं कलाकारों का स्वागत करते हुए परिचर्चा के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कला और रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक चेतना के विकास का सशक्त उपकरण हैं।

संस्कार भारती विश्वविद्यालय इकाई की अध्यक्षा प्रो. सरोज रानी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत रंगमंच और अभिनय की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए थिएटर की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है। उन्होंने वरिष्ठ रंगकर्मी श्रीमती बीना सहाय को अपने विचार रखने के लिए आमंत्रित किया। बीना सहाय ने कहा कि रंगमंच विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति क्षमता, संवेदनशीलता और सामाजिक समझ विकसित करता है। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में कला और संस्कृति को जो महत्व दिया गया है, वह भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है।

परिचर्चा में डॉ. दीपक कुमार, गुंजन शुक्ल, उमेश भाटिया, नवीन चंद्रा, सुधीर पाण्डेय, उपेन्द्र सहस्त्रबुद्धे और संघर्ष प्रताप सहित कई रंगकर्मियों ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने काशी के रंगमंच की वर्तमान चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आर्थिक अभाव और उपयुक्त मंचों की कमी के कारण स्थानीय कलाकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

रंगकर्मी नवीन चंद्रा ने विशेष रूप से लोक एवं ग्रामीण रंगमंच की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि भारतीय रंग परंपरा की असली आत्मा गांवों और लोककलाओं में बसती है। उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीण रंगमंच को बढ़ावा मिले तो नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रह सकेगी।

कार्यक्रम में इंस्टिट्यूट ऑफ फाईन आर्ट्स की शैक्षणिक गतिविधियों की भी चर्चा हुई। यह संस्थान इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से संबद्ध ललित कलाओं को समर्पित एक विशिष्ट स्नातकोत्तर महाविद्यालय है, जहां चित्रकला, मूर्तिकला, गायन, तबला, कथक और थिएटर जैसे विषयों में डिप्लोमा, स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती है।

परिचर्चा के अंत में विदुषी अभ्रदिता बैनर्जी ने संपूर्ण वंदेमातरम् का सुमधुर गायन प्रस्तुत कर वातावरण को देशभक्ति और सांस्कृतिक ऊर्जा से भर दिया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. अनिल कुमार सिंह ने सभी अतिथियों, कलाकारों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में आईएफए के शिक्षकगण, विद्यार्थी एवं शहर के अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

Share this article

Facebook
Twitter X
WhatsApp
Telegram
 
June 2026
M T W T F S S
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
2930