स्थानीयों का आरोप—केंद्र सरकार के कर्मचारी महीनों नहीं आते, सुविधाओं का अभाव; डीएम के आदेश के बावजूद समय से पहले बंद हो जाता है परिसर
सेंट्रल डेस्क l केएमपी भारत l नई दिल्ली।
कृष्ण मुरारी पांडेय l नई दिल्ली।:
सिवान जिले के जीरादेई स्थित भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पैतृक निवास आज भी उनकी सादगी, त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल पेश करता है। यह ऐतिहासिक स्मारक न केवल स्वतंत्रता संग्राम की यादों को संजोए हुए है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नींव से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। हालांकि, मौजूदा समय में यह गौरवशाली धरोहर बदहाल व्यवस्थाओं का शिकार होती नजर आ रही है। https://youtu.be/1HvcTUIduu0?si=1F8RY5JklrWOL_oR
सोमवार 13 अप्रैल 2026 को केएमपी भारत की टीम जब स्थल पर पहुंची, तो स्थानीय लोगों ने कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि स्मारक की देखरेख की जिम्मेदारी जिन कर्मचारियों पर है, वे शायद ही कभी यहां नजर आते हैं। वर्तमान में यहां माली राजनाथ राम और अरविंद साह ही न केवल बागवानी, बल्कि अन्य सभी कामों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में पूरे परिसर की व्यवस्था लगभग सफाई कर्मियों और माली के भरोसे चल रही है।

केंद्र सरकार के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा यहां दो केयरटेकर—भानु प्रताप सिंह और कुंदन कुमार शर्मा—को नियुक्त किया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दोनों पिछले करीब चार वर्षों से यहां तैनात हैं, लेकिन अधिकतर समय अनुपस्थित रहते हैं। पचरुखी प्रखंड के जयसवली गांव निवासी भानु प्रताप सिंह ने बताया कि वे फिलहाल निलंबित हैं, इसलिए ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं। वहीं, कुंदन कुमार शर्मा ने कहा कि वे साप्ताहिक अवकाश के कारण उस दिन उपस्थित नहीं हो सके।
स्थानीय निवासी योगेंद्र साह का कहना है कि उन्होंने इन दोनों कर्मचारियों को शायद ही कभी यहां देखा हो। उन्होंने बताया कि कर्मचारियों के रहने के लिए कमरे और बिजली जाने पर जनरेटर तक की व्यवस्था है, लेकिन इसके बावजूद वे यहां नहीं रहते। आरोप है कि जब भी किसी अधिकारी के आने की सूचना मिलती है, तो माली द्वारा फोन करने पर ये कर्मचारी समय पर पहुंच जाते हैं और निरीक्षण के बाद फिर चले जाते हैं।

एक अन्य स्थानीय निवासी सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि यहां आने वाले पर्यटकों के लिए पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं है।

न तो कोई विजिटर रजिस्टर है और न ही पर्यटकों के लिए कोई उचित व्यवस्था। उन्होंने सवाल उठाया कि भारतीय पुरातत्व विभाग के नियम-कानून आखिर यहां लागू क्यों नहीं हो रहे हैं।

स्थिति यह है कि स्मारक शाम 5 बजे ही बंद कर दिया जाता है, जबकि जिलाधिकारी विवेक रंजन मैत्रेय द्वारा निर्देश भी दिया गया है कि इसे दो शिफ्ट में सुबह 7 बजे से रात 8 बजे तक खोला जाए। बावजूद इसके कर्मचारी आदेशों की अनदेखी कर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि देश के प्रथम राष्ट्रपति की यादों से जुड़ा यह महत्वपूर्ण स्थल कब तक उपेक्षा का शिकार होता रहेगा और जिम्मेदार विभाग कब जागेगा।

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जीरादेई में सहेजी गई इतिहास की धरोहर: देश के प्रथम राष्ट्रपति का पैतृक घर आज भी देता है प्रेरणा
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के जीवन, त्याग और विरासत की जीवंत झलक दिखाता है यह स्मारक
नई दिल्ली। सिवान जिले के जीरादेई गांव में स्थित डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का पैतृक निवास आज भी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की सादगी, त्याग और राष्ट्रभक्ति की कहानी बयां करता है। यह स्मारक न सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय लोकतंत्र की नींव से जुड़ी एक जीवंत धरोहर भी है।

3 दिसंबर 1884 को जन्मे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रीय सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण रहा। वे एक सफल वकील थे, लेकिन महात्मा गाँधी के नेतृत्व और विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने वकालत छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उनका यह त्याग उन्हें देश के सबसे सम्मानित नेताओं में शामिल करता है।
संविधान निर्माण में अहम भूमिका, दो बार बने राष्ट्रपति
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में भारत के संविधान को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में देश का लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत आधार पर खड़ा हुआ। स्वतंत्र भारत में उन्हें 1952 से 1957 और फिर 1957 से 1962 तक लगातार दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुना गया—जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

देश के प्रति उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए उन्हें 1962 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
परंपरागत वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है यह भवन
जीरादेई स्थित यह पैतृक निवास भारतीय ग्रामीण उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार की पारंपरिक वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है। अंग्रेजी के ‘L’ आकार में निर्मित यह भवन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल की निर्माण शैली को दर्शाता है।

भवन दो मुख्य हिस्सों—पुरुष भाग और महिला भाग—में विभाजित है। महिला भाग एक द्वितल (दो मंजिला) वर्गाकार संरचना है, जिसके बीच में एक खुला आंगन है और चारों ओर बरामदे बने हुए हैं। वहीं पुरुष भाग एक मंजिला है, जिसके सामने सुंदर उद्यान स्थित है।
इस भवन के निर्माण में पकी ईंट, चूना-सुर्खी का गारा, लकड़ी के शहतीर और पकी मिट्टी के टाइल (रूपरा) का उपयोग किया गया है, जो उस समय की पारंपरिक तकनीक को दर्शाता है।

आकर्षण का केंद्र बनी संगमरमर की प्रतिमा
भवन के सामने स्थित उद्यान के मध्य एक आधुनिक गोलाकार संरचना में संगमरमर से बनी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की आकर्षक मूर्ति स्थापित है, जो यहां आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।
आज यह स्मारक न केवल इतिहास प्रेमियों के लिए बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि सादगी, त्याग और देशभक्ति से ही महानता हासिल की जा सकती है।
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राष्ट्रीय महत्व का स्मारक, नुकसान पहुंचाने पर सख्त सजा का प्रावधान
ASI की चेतावनी: 100 मीटर क्षेत्र में पूर्ण प्रतिबंध, 200 मीटर तक निर्माण के लिए अनुमति जरूरी
नई दिल्ली। देश की ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने संरक्षित स्मारकों को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ASI द्वारा स्पष्ट किया गया है कि जिन स्मारकों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है, उनके साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ या नुकसान पहुंचाना दंडनीय अपराध है।

विभाग के अनुसार, प्राचीन संस्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत ऐसे स्मारकों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। यदि कोई व्यक्ति स्मारक को क्षति पहुंचाता है, उसे नष्ट करता है, उसका स्वरूप बदलता है या किसी भी तरह से दुरुपयोग करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत दोषी को दो साल तक की जेल या एक लाख रुपये तक का जुर्माना, अथवा दोनों की सजा हो सकती है।

ASI ने आम लोगों और स्थानीय निवासियों को विशेष रूप से आगाह किया है कि संरक्षित स्मारक के आसपास के क्षेत्र में भी नियमों का पालन करना अनिवार्य है। प्राचीन संस्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष नियम, 1959 के अनुसार, स्मारक से 100 मीटर के दायरे को “निषिद्ध क्षेत्र” घोषित किया गया है, जहां किसी भी प्रकार का निर्माण या खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इसके अतिरिक्त, स्मारक के 200 मीटर के दायरे को “विनियमित क्षेत्र” माना गया है। इस क्षेत्र में भवन निर्माण, मरम्मत या किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने के लिए सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।

ASI के महानिदेशक ने लोगों से अपील की है कि वे देश की ऐतिहासिक विरासत की रक्षा में सहयोग करें और नियमों का पालन सुनिश्चित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन धरोहरों को सुरक्षित रखा जा सके।






